आज हम एक ऐसे शख्स की बात करने जा रहे हैं, जिसके पास अपने कॉलेज की फीस भरने तक के पैसे नहीं थे और आज वह इंसान 200 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी का मालिक हैं।

अमित ने मात्र 19 साल की उम्र से ही काम करने की शुरुआत कर दिया  था। अमित कभी होम ट्यूटर हुआ करते थे, फिर उन्होंने अपनी खुद की कोचिंग शुरु कर ली। इसके बाद वे मोबाइल रिपेयरिंग करना भी सीखा, अब मेटास ओवरसीज लिमिटेड के CEO हैं। जब अमित कोचिंग पढ़ा करते थे, तब उनके महीने की कमाई मात्र ₹15000 हुआ करती थी। जब उन्होंने अपना इंस्टिट्यूट शुरू किया, तब उनके महीने की कमाई चार लाख तक हो चुकी थी, इसके बाद अमित ने अपनी कंपनी शुरू की।

अमित का बचपन से ही मानना था, कि वे एक रईस परिवार से ताल्लुक रखते हैं, क्योंकि उनके व उनके भाई बहनों के पास तीन-तीन यूनिफॉर्म होती थीं। लेकिन जब वे 12वीं पास कर कॉलेज में एडमिशन लेने गए,  तब पता चला कि वे लोग रईस नहीं हैं। बल्कि उन्हें जरूरत की सारी चीजें मां-बाप ने उपलब्ध करवाई हैं। उनकी सच्चाई तो यह थी, कि वे अपने कॉलेज की फीस ₹12000 तक जमा नहीं कर पा रहे थे । उस दिन लगा कि दुनिया हम से बहुत आगे है।

यह स्टोरी है, दिल्ली के रहने वाले डॉ. अमित माहेश्वरी की। जामुना के कॉलेज में फीस जमा करने की दिक्कत हुई, तो उन्होंने सोचा कि वह एकाउंट्स में काफी अच्छे हैं, तो उन्हें कोचिंग शुरू करनी चाहिए। इससे जो भी पैसा आएगा वे उससे अपने कॉलेज फीस में जमा कर देंगे। शुरू मे उन्होने  काम खोजना शुरू किया पर उन्हें अपनी कोचिंग में कोई भी पढ़ाने की अनुमति नहीं दे रहा था, क्योंकि उनका कहना था कि अभी तो वह  केवल 12वी पास है वह दूसरों को कैसे पढ़ा सकते हैं, तो उन्होंने होम कोचिंग की पोस्टर दीवारों पर लगानी शुरू कर दी। फिर वे 1200 रुपए की फीस में पढ़ाना शुरू किया।

पोस्टर चिपकाने के कुछ ही दिन बाद उनके पास फोन भी आने शुरू हो गए। लोगों को उनके पढ़ाने का तरीका अच्छा लगने लगा तो लोग उन्हें 1200 रुपए की फीस में हायर करने लगे। उन्होंने एक इंस्टीट्यूट में जाकर कुल 40 बच्चों को पढ़ाया उसके बाद उन्होंने सोचा कि क्यों ना वह भी अपना एक इंस्टिट्यूट खोल ले। फिर उन्होंने अपने घर में ही इंस्टिट्यूट शुरू कर ली। इससे भी महीने का लगभग 15 से ₹20000 कमा लेते ।

फिर वे दूसरे टीचर को रखकर पढ़ाना शुरू किया। जब दूसरे टीचर उनके बच्चों को अच्छा पढ़ाने लगी तब वह सोचे कि क्यों ना आपने इंस्टिट्यूट का दूसरा ब्रांच खोल लिया जाए।  अब उनकी मंथली अर्निंग करीब 4 लाख रुपए तक हो गई थी और आज उनके इंस्टिट्यूट की लगभग 8 ब्रांच खुल चुकी है।

इसके बाद वे अपनी इंस्टिट्यूट को मैनेज करने के लिए एक सेकंड हैंड मोबाइल खरीदा फिर उस मोबाइल में उन्हें कुछ दिक्कत आने लगी तो वे उसे बनवाने के लिए टेक्नीशियन के पास ले गए, उन्होंने देखा कि वह टेक्नीशियन कम मेहनत में ज्यादा पैसा कमा लेता है, तो उन्होंने उस टेक्नीशियन से कहा कि तुम महीने का जितना कमा लेते हो उतना तुम मुझसे ले लो और मुझे भी मोबाइल बनाना सिखा दो।

जब वे मोबाइल रिपेयरिंग करना सीख गए, तो उन्होंने इसका एक सिलेबस तैयार किया और इसे अपनी कोचिंग में लॉन्च कर दिया। यह लांच करने से उन्हें काफी अच्छा रिस्पांस मिला और उनकी कमाई भी दोगुनी बढ़ गई थी

जब यह  काम अच्छा चलने लगा तो इन्होंने इसकी  फ्रेंचाइजी देने की सोची तो उन्होंने इसके लिए एक न्यूज़ चैनल में इसका विज्ञापन दे दिया। इससे पूरे दिल्ली से उनके पास इंक्वायरी आईं और फिर कई फ्रेंचाइजी शुरू हो गईं।

इतना सब कुछ होने के बाद भी उनके मन में हमेशा यह चलते रहता था, कि वे इसके अलावा और क्या कर सकते हैं? कैसे और आगे बढ़ सकते हैं? फिर उन्होंने  स्टील मार्केट की स्टडी की  और फिर भी इस काम को समझने के लिए जर्मनी चले गए। वापस लौटकर स्टील मैन्यूफैक्चरिंग का काम शुरू कर दिया। 2014 में उनकी अपनी कंपनी Mettas ओवरसीज लिमिटेड बन चुकी थी।

उनका कहना है कि, कोई भी काम शुरू करने से पहले उसका क्लोजिंग डेट तय करो। जिस भी काम में आप अपना सौ प्रतिशत देंगे, उसमें आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here